Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 23, Verses 33–35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 23, verses 33–35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 23 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
न वरमेकमहीतलराजता न च वरं विबुधामररूपता ।
न च वरं धरणीतलनागता स्थितिमुपैति हि यत्र सतां मनः ॥ ३३ ॥
न वरमाकुलशास्त्रविचारणं न च वरं परकार्यविवेचनम् ।
न वरमग्र्यकथाक्रमवर्णनं स्थितिमुपैति हि यत्र सतां मनः ॥ ३४ ॥
न वरमाधिमयं चिरजीवितं न च वरं मरणं दृढमूढता ।
न च वरं नरको न च विष्टपं स्थितिमुपैति हि न क्वचिदाशयः ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
निरन्तर उत्पन्न एवं विनष्ट होनेवाली, अत्यन्त अद्भुत, तलवार की धार के
सदृश इन्द्रिय आदि की चेष्टाओं में भी कुछ स्थिर सुख नहीं है ॥ ३ २॥
उस प्रकार अस्थिर एवं तुच्छ होने से जगत सम्बन्धी किसी भी सुख की विवेकी पुरुषों को स्पृहा
नहीं करनी चाहिए, यों कहते है ।
महाराज, सम्पूर्ण पृथ्वीतल में एकमात्रराजरूपता (सम्पूर्ण भू-मण्डल का एकच्छत्र सार्वभोम राजा
होना) श्रेष्ठ नहीं है, सबसे बड़े अभिज्ञ इन्द्र, बृहस्पति (पाताल में) सम्पूर्ण पृथ्वी के धारण में समर्थ
शेषनागरूप होना यानी पाताल का अधिपति होना भी श्रेष्ठ नहीं हे, क्योकि जहाँ विवेकी पुरुषों का मन
पूर्णकाम होकर विश्रान्ति पाता है, वैसा वहाँ कुछ भी तात्तिविक सुख नहीं हे