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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 23, Verses 31–32

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 23, verses 31–32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 23 · श्लोक 31

संस्कृत श्लोक

हृत्क्षीरोदकसंस्पन्दमन्दरेषु चलेष्वपि । स्वसंकल्पविकल्पेषु न किंचित्सुस्थिरं शुभम् ॥ ३१ ॥ अनारतागमापायपरास्वसिशिरास्वपि । चित्राकारासु चेष्टासु न किंचित्सुस्थिरं शुभम् ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

मनरूपी क्षीर-सागर के मंथन में मन्दराचल का आचरण करनेवाले अपने संकल्प, विकल्प आदि मानसिक व्यापारो में भी कुछ स्थायी कल्याण नहीं है