Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 23, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 23, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 23 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
तरलीकृतचित्तासु हृदयानन्दिनीषु च ।
चिन्तासु धीविकारासु नकिंचित्सुस्थिरं शुभम् ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
जिन्होंने चित्त तरल कर दिया है तथा जो मन में आनन्द देते हैं, ऐसे बुद्धि के विकारभूत
मानसक्रियाजन्य फलों में कुछ भी स्थिर कल्याण नहीं है