Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 24, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 24, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 24 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
भुशुण्ड उवाच ।
एकैव केवला दृष्टिर्निरापाया गतभ्रमा ।
विद्यते सर्ववित्त्वेषु सर्वश्रेष्ठा समुन्नता ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि जगत में कुछ भी सुन्दर और स्थिर नहीं है, तो वैसा कौन शोभन और स्थिर है, जिसमें विवेकी
पुरुष की चित्त- विश्रान्ति होती है, इस पर कहते है ।
महाराज, कभी नष्ट न होनेवाली, विभ्रमो से शून्य एकमात्र आत्मदुष्टि ही समस्त ज्ञानो के बीच में
सब अंशो में श्रेष्ठ ओर सबसे उन्नत हे
सर्ग सन्दर्भ
तेईसवाँ सर्ग समाप्त चौबीसवाँ सर्ग देहनाड़ी के क्रम से युक्त षट्चक्र हृदय से अन्वित तथा प्राण के स्पन्दनं के विभागों से आढ्य प्राणचिन्तन का वर्णन |