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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 24, Verse 2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 24, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 24 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

आत्मचिन्ता समस्तानां दुःखानामन्तकारिणी । चिरसंभृतदुःस्वप्नसंसारभ्रमहारिणी ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मन्‌, साक्षात्कार पर्यन्त किया गया आत्मा का विचार समस्त दुःखों का अन्त कर देनेवाला तथा अनादिकाल से लेकर आज तक चले आ रहे कामकर्मजनित वासनाओं से परिपूर्ण, दुःस्वप्न के सदृश, संसाररूपी भ्रम का विनाश करनेवाला है