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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 24, Verse 23

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 24, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 24 · श्लोक 23

संस्कृत श्लोक

चलत्सु तेषु पत्रेषु स मरुत्परिवर्धते । वाताहते लतापत्रजाले बहिरिवाभितः ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

उससे प्रकृत मे क्या आया ? इस पर कहते है । मुनिवर, जब उक्त वायुओं से हृदय-कमल के पत्ते संकुचित एवं विकसित होते हैं, तब चारों ओर के प्रसार से पुरीतत्‌ में सम्बद्ध सभी नाड़ियों के छिद्रों मे प्रविष्ट होकर वायु उस प्रकार वर्धित होता हे, जिस प्रकार अरण्य में लता, पत्र आदि के वायु द्वारा आहत होनेपर वह चारों ओर से वर्धित होता है