Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 25, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
तं बाह्यरेचकं विद्याच्चिन्त्यमानं विमुक्तिदम् ।
द्वादशान्ताद्यदुत्थाय रूपपीवरता परा ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
बाहर के बारह अंगुल के अन्तिम भाग से नासिका के अग्रभागतक अपानवायु की संचार द्वारा
स्वरूपाभिव्यक्ति से जो विशाल स्थूलता प्राप्त होती है, वह दूसरा बाह्मपूरक है, यों विद्वान लोग कहते
हैं