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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verse 2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 25, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

भुशुण्ड उवाच । जानन्नपि मुने सर्व किं मां पृच्छसि लीलया । यथापृष्टमहं वच्मि शृणु तत्रापि मद्वचः ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

भुशुण्ड ने कहा : हे मुने, सब कुछ जानते हुए भी आप मुझसे लीलावश पूछते हैं, यह मैं अनुमान करता हूँ। अच्छा, आपने जिस तरह प्रश्न किया है, उसका उत्तर मैं तदनुरूप देता हूँ, उस विषय में भी मेरे वचनों का श्रवण कीजिए