Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 25, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
इत्थं स कथयन्पक्षी पृष्टस्तत्र पुनर्मया ।
कीदृशी प्राणवातस्य गतिरित्येव राघव ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
वर्णन किये जानेवाले प्रकार के विषय में प्रश्न का अवसर दे रहे भुशुण्डजी वणित प्राणविज्ञान का
उपसंहार करते है।
हे महात्मन्, हृदय आदि स्थानों में निरन्तर संचरण कर रहे प्राण ओर अपान वायुओं की अनेक
श्रुतियों मे तत्-तत् प्राणोपासना प्रकरण में अनेक तरह से विहित निर्दोषत्व, श्रमरहितत्व, अभग्नव्रतत्त्व,
संवर्ग आदि अनेक गुणविशिष्ट गति का अनुसरण कर यानी आगे कहे जानेवाले प्रकार से उपासना कर
पुरुष मृत्युरूपी फन्दा से छुटकारा पाता हुआ तत्त्वज्ञान से जीवन्मुक्त होकर पुनः इस संसार में उत्पन्न
नहीं होता। हि“ शब्द यह द्योतन करता है-निष्काम बुद्धि से अनुष्ठित प्राण आदि की उपासना भी ज्ञान
द्वारा मुक्ति की हेतु है, यह श्रुतियों मे प्रसिद्ध है॥ ३ ८॥
चौबीसवाँ सर्ग समाप्त
पचीसवाँ सर्ग
प्राण ओर अपान की गतियो मेँ रेचक आदि की कल्पना तथा
उनकी उत्पत्ति और विनाश के स्थान ब्रह्म का वर्णन ।
प्रश्नावसर के प्रदान से सूचित हुआ चिन्तनीय प्राणोपासना का विशेष प्रकार मैंने पूछा है, यों
कहते है ।
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, उस प्रकार पक्षी कह ही रहा था कि उस विषय में मेने
उससे फिर यह प्रश्न किया-हे पक्षीन्द्र, प्राणवायु की गति का स्वरूप क्या है ?