Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 24, Verses 37–38
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 24, verses 37–38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 24 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
सहस्रविनिकृत्ताङ्गाद्बिसतन्तुलवादपि ।
दुर्लक्ष्या विद्यमानापि गतिः सूक्ष्मतराऽनयोः ॥ ३७ ॥
अविरतगतयोर्गतिं विदित्वा हृदि मरुतोरनुसृत्य चोदितां ताम् ।
न पुनरिह हि जायते महात्मन्मुदितमनाः पुरुषः प्रणष्टपाशः ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
प्राणायाम के अभ्यास से उनमें अतिसूक्ष्मरूपता की प्राप्ति हो जाने के कारण भी उत्क्रमण आदि
की प्रसक्ति नहीं है, यो अथवा मुखनासिका मे जैसे इनका संचार लक्षित होता है वैसे नाडयो मे लक्षित
(८) आध्यात्मिक परिच्छिन्नता का परित्याग कर आधिदैविक सूत्रात्मस्वरूप ही मैं हूँ, इस प्रकार की भावना
द्वारा आसंग पाप से दूषित समस्त इन्द्रिय व्रतो का परित्याग कर एकमात्र प्राणव्रत का आचरण करना ही प्राण और
अपान की गति का अनुसरण है । वाक् आदि इन्द्रियों की जो वचन आदि अपने अपने विषयों में व्यसनिता है, वही
उनका व्रत है, ये आसंगरूपी पाप से दूषित हैं, अतः मृत्युरूप श्रम ने उन्हें नष्ट कर दिया । प्राण का व्रत मुख, नासिका
आदि स्थाना में संचरण करना है, वह विषयासंग दोष से दूषित न होने के कारण मृत्युरूपी श्रम से नष्ट नहीं होता ।
अकेला प्राण ही व्रतभंगशून्य ओर मृत्यु के आक्रमण से रहित है, इसलिए प्राणरूपता की भावना और उसके व्रतानुष्ठान
रूप प्राण-चिन्तन से मैने मृत्युपर विजय पाई है, यह तात्पर्य है ।
क्यो नहीं होता, इस पर कहते हैं।
एक हजार अंशों मे विभक्त बिसतन्तु के लवमात्र की अपेक्षा भी अत्यन्त दूर्लक्ष्य नाडियाँ है, अतः
उनमें विद्यमान भी इन प्राण और अपान दोनों वायुओं की गति दुर्बोध है । नाडियों की सूक्ष्मरूपता में
“यथा केशः सहस्रधा भिन्नस्तावताणिम्ना तिष्ठति" (एक हजार अंशों मेँ विभक्त केश जिस प्रकार
अतिसूक्ष्म रहता है, उस प्रकार यह नाडी अति सूक्ष्म है) यह श्रुति प्रमाण है