Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 24, Verses 35–36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 24, verses 35–36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 24 · श्लोक 35,36
संस्कृत श्लोक
तयोर्ममानुसरतः प्राणापानाभिधानयोः ।
गतिं शरीरमरुतोराशरीरमरुद्धयोः ॥ ३५ ॥
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तेषु सदैव समरूपयोः ।
सुषुप्तसंस्थितस्येव ब्रह्मन् गच्छन्ति वासराः ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
महर्षे, उन प्राण ओर अपान नामक शरीर-वायुओं की-जो जीवनपर्यन्त अविच्छिन्न उपासित तथा
जाग्रत स्वप्न ओर सुषुप्ति में सदा समानरूप, अधिक अभ्यास के कारण बाहर और भीतर बारह या
सोलह अंगुलप्रदेश परिमित संचरणवाले हैं -गति का अनुसरण कर रहे मेरे दिन, सुषुप्ति अवस्था में
अवस्थित की नाई, व्यतीत हो रहे हैँ