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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 24, Verse 34

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 24, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 24 · श्लोक 34

संस्कृत श्लोक

शरीरपुरपालस्य मनसो रथचक्रयोः । अहंकारनृपस्यास्य प्रशस्येष्टतुरङ्गयोः ॥ ३४ ॥

हिन्दी अर्थ

महाराज, शरीररूपी नगर के रक्षक मन के रथ के वे दोनों पहिये हैं और अहंकाररूपी इस राजा के सुन्दर एवं इष्ट दोनों घोड़े हैं