Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 25, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
एते निरोधमायान्ति प्रकृत्याऽतिचलानिलाः ।
यत्करोति यदश्नाति बुद्ध्यैवालमनुस्मरन् ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि का अभिमान भी इससे नष्ट हो जाता है, यों कहते हैं।
मनुष्य अपने भीतर बुद्धिपूर्वक पर्याप्तरूप से इन कुम्भक आदि प्राणायामों का ध्यान करता हुआ
यदि कुछ करता है या खाता है, तो उनमें वह कर्तृत्व आदि के अभिमान से तनिक भी ग्रस्त नहीं
होता