Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 25, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
कुम्भकादीन्नरः स्वान्तस्तत्र कर्ता न किंचन ।
अव्यग्रमस्मिन्व्यापारे बाह्यं परिजहन्मनः ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
प्राणायाम के अभ्यास से बाह्यद्ष्टि का परित्याग, तदनन्तर अन्तरात्मा के साक्षात्कार की उत्पत्ति,
तदनन्तर परमपद-प्राप्ति, यो प्राणचिन्तन से परमपद की प्राप्ति भी होती है, ऐसा कहते है।
महाराज, इस प्राणचिन्तनरूप व्यापार में संलग्न होकर बाह्य अर्थो का परित्याग कर रहा मन
कुछ ही दिनों में अद्वितीय परम पद को प्राप्त हो जाता है