Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verse 26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 25, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
प्राप्तप्राप्तव्यमखिलं तैरखिन्नास्त एव हि ।
तिष्ठता गच्छता नित्यं स्वपता जाग्रता तथा ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज, बैठते,
चलते, सोते ओर जागते-सदा-सर्वदा पुरुष यदि इसी दृष्टि की उपासना करें, तो वे कभी बन्धन
को प्राप्त ही न हों