Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 25, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
एषा चेत्प्रेक्ष्यते दृष्टिस्तन्न बन्धनमाप्यते ।
प्राणापानानुसरणप्राप्तबोधवतामलम् ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
प्राण ओर अपान की उपासना द्वारा प्राप्त हुए तत्त्वज्ञान से सम्पन्न पुरुषों
कामन, जो मलरूप मोह से वर्जित एवं स्वस्थ है, इस भीतरी प्रत्यगात्मा में ही भली प्रकार लगा हुआ
रहता है