Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verse 35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 25, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
मुखाग्रगगनं पश्चात्तापयत्युत्तमो रविः ।
अपानेन्दुर्मुखाग्रं तु प्लावयित्वा हृदम्बरम् ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
अपान-वायुरूप यह चन्द्रमा पहले मुख के अग्रभाग को पुष्टकर
उसके क्षणभर ही पीछे हृदयाकाश का (अपने अमृत-प्रवाह से) पोषण करता है