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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verse 37

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 25, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 37

संस्कृत श्लोक

यत्र ग्रस्ता तदासाद्य पदं भूयो न शोच्यते । प्राणार्कस्य तथान्तस्था यत्रापानसितांशुना ॥ ३७ ॥

हिन्दी अर्थ

प्राणरूपी सूर्य के भीतरी एक कला का अपानरूपी चन्द्रमा के साथ जिस पद में सम्बन्ध होता है, उस पद को प्राप्तकर मनुष्य पुनः जन्म प्राप्त नहीं करता