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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 25, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

अपानोऽप्यनिशं ब्रह्मन्स्पन्दशक्तिः सदागतिः । सबाह्याभ्यन्तरे देहे त्वपानोऽयमवाक्स्थितः ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

हे ब्रह्मन्‌, इस अपानवायु में भी निरन्तर स्पन्दशक्ति तथा सतत गति रहती है । यह अपानवायु भी बाह्य एवं आन्तर समस्त अंगों से परिपूर्ण शरीर में नीचे के स्थान में निरन्तर अवस्थित रहता है यानी अधोभाग में गमन करता है