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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verse 47

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 25, verse 47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 47

संस्कृत श्लोक

पदात्तस्मादुदेत्यन्तः प्राणार्को बहिरुन्मुखः । अपानेऽस्तंगते प्राणः समुदेति हृदम्बुजात् ॥ ४७ ॥

हिन्दी अर्थ

अपान-वायु का अस्त हो जाने पर हृदय-कमल से प्राण का वहाँ उस प्रकार शीघ्र उदय हो जाता है, जिस प्रकार निशारूप छाया का विनाश हो जाने पर वहाँ सूर्य के प्रकाश का