Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verse 48
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 25, verse 48 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 48
संस्कृत श्लोक
छायायां गलिताङ्गायां तत्रैवाशु यथातपः ।
प्राणे त्वस्तंगते बाह्यादपानः प्रोदितः क्षणात् ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
चारों ओर से सूर्य के प्रकाश
के नष्ट हो जाने पर जिस प्रकार उसके पीछे क्षणभर में ही छायारूप अन्धकार का उदय हो जाता
है, उसी प्रकार प्राणरूप सूर्य के प्रकाश का अस्त हो जाने पर क्षणभर में ही बाहर से अपान का
उदय हो जाता है