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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verse 51

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 25, verse 51 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 51

संस्कृत श्लोक

बहिः कुम्भकमालम्ब्य चिरं भूयो न शोच्यते । अपानेऽस्तंगते प्राणे किंचिदभ्युदयोन्मुखे ॥ ५१ ॥

हिन्दी अर्थ

अपान-वायु के अस्त होने पर ओर प्राण-वायु के तनिक उदयोन्मुख होने पर भीतरी कुम्भक का चिरकाल तक अवलम्बन करने से योगी पुनः इस संसाररूपी शोक से ग्रस्त नहीं होता