Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verse 50
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 25, verse 50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 50
संस्कृत श्लोक
अपानजन्मभूमौ च प्राणं नष्टमवेहि हि ।
अस्तंगतवति प्राणे त्वपानेऽभ्युदयोन्मुखे ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
प्राण-वायु के अस्त हो जाने पर और अपान-वायु के
उदयोन्मुख होने पर बाह्य कुम्भक का चिरकाल तक अवलम्बन करने से योगी फिर संसारूपी शोक
से ग्रस्त नहीं होता