Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verse 53
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 25, verse 53 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 53
संस्कृत श्लोक
स्वच्छं कुम्भकमभ्यस्य न भूयः परितप्यते ।
अपाने रेचकाधारं प्राणपूरान्तरास्थितम् ॥ ५३ ॥
हिन्दी अर्थ
नासिका-छिद्र से अपान-वायु का भीतर प्रवेश होने पर
बाह्य रेचक के आधारभूत, प्राण के पूरण के लिए भीतर प्रविष्ट देहान्तर्गत पूरक की उपासना करने
से मनुष्य पुनः संसार में उत्पन्न नहीं होता