Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verse 54
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 25, verse 54 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 54
संस्कृत श्लोक
स्वसंस्थं पूरकं दृष्ट्वा न भूयो जायते नरः ।
प्राणापानावुभावन्तर्यत्रैतौ विलयं गतौ ॥ ५४ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस हृदयवर्तीं ब्रह्मरूप स्थान में ये प्राण ओर
अपान दोनों विलीन हो जाते हैं, उस शान्त, आत्मस्वरूप ब्रह्मरूप पद का अवलम्बन करने से योगी
अनुतप्त नहीं होता