Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verse 56
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 25, verse 56 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 56
संस्कृत श्लोक
विचार्य बहिरन्तर्वा न भूयः परिशोच्यते ।
अपानभक्षणपरे प्राणे हृदि तथा बहिः ॥ ५६ ॥
हिन्दी अर्थ
प्राण-वायु के अपानभक्षणोन्मुख होने पर बाहर और भीतर पूर्वोक्त चैतन्य में देश, काल
एवं तदनन्तर्वर्ती समस्त पदार्थ निष्कल ब्रह्मस्वरूप ही हैं, ऐसी उपासना करने से पुरुष का मन पुनः
उत्पन्न नहीं होता