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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verse 57

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 25, verse 57 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 57

संस्कृत श्लोक

देशं कालं च संप्रेक्ष्य न भूयो जायते मनः । यत्र प्राणो ह्यपानेन प्राणेनापान एव च ॥ ५७ ॥

हिन्दी अर्थ

जिस परब्रह्मरूप चैतन्य मे अपान के साथ प्राण का, प्राण के साथ अपान का तथा उन दोनों के साथ बाह्य एवं आन्तर देश-काल का विलय हो जाता है, उसी परब्रह्मरूप पद का आप दर्शन कीजिए