Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verse 58
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 25, verse 58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 58
संस्कृत श्लोक
निगीर्णौ बहिरन्तश्च देशकालौ च पश्य तौ ।
क्षणमस्तंगतप्राणमपानोदयवर्जितम् ॥ ५८ ॥
हिन्दी अर्थ
प्राण और अपान के सन्धिकाल मे सभी प्राणियों को उक्त अवस्था रहती है, परन्तु उसका अनुभव
केवल योगी लोग ही कर पाते हैं, दूसरे नहीं कर पाते, ऐसा कहते हैं।
जिस समय अपान के आविर्भाव से वर्जित प्राण अस्त हुआ रहता है उस समय किसी प्रकार के यत्न
के विना सिद्ध हुई बाह्य जो कुम्भक अवस्था है उसी को योगी लोग “तत्पद” कहते हैं