Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verse 59
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 25, verse 59 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 59
संस्कृत श्लोक
अयत्नसिद्धबाह्यस्थं कुम्भकं तत्पदं विदुः ।
अयत्नसिद्धो ह्यन्तस्थकुम्भकः परमं पदम् ॥ ५९ ॥
हिन्दी अर्थ
किसी
प्रकार के यत्न के बिना ही सिद्ध हुआ अन्तःस्थ कुम्भक सर्वातिशायी ब्रह्मरूप परम पद है