Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verse 69
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 25, verse 69 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 69
संस्कृत श्लोक
यत्र प्राणोऽस्तमायाति यत्रापानोऽस्तमेति च ।
यत्र द्वावप्यनुत्पन्नौ तच्चित्तत्त्वमुपास्महे ॥ ६९ ॥
हिन्दी अर्थ
अव बाह्य ओर आन्तर प्रदेशरूप उपाधिभेद का परित्याग कर यतश्चोदेति सूर्योऽस्तं यत्र च गच्छति ।
तं देवाश्चक्रिरे धर्म स एवाद्य स उ श्व एतद्रे तत् इस श्रुत्यर्थ को मन में लेकर कहते है ।
जहाँ पर प्राण विलीन हो जाता है, जहाँ अपान भी अस्त हो जाता है ओर जहाँ प्राण ओर अपान
दोनों उत्पन्न भी नहीं होते, हम लोग उस चित्तत््व की उपासना करते हैं