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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verse 7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 25, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

द्वादशाङ्गुलपर्यन्तं बाह्यमाक्रमतामधः । प्राणानामङ्गसंस्पर्शो यः स पूरक उच्यते ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

बारह अंगुलपर्यन्त बाह्य प्रदेश की ओर नीचे जा रहे प्राणों का (प्राणवृत्तियों का) जो शरीर के अंगों के साथ स्पर्श होता है, उसे पूरक कहते हैं