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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verse 8

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 25, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

बाह्यात्परापतत्यन्तरपाने यत्नवर्जितः । योऽयं प्रपूरणः स्पर्शो विदुस्तमपि पूरकम् ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मन्‌, बाह्य-प्रदेश से शरीर के भीतर की ओर अपान के प्रवेश करनेपर यत्न के बिना शरीर की पूर्तिं करनेवाला जो यह स्पर्श होता है, उसको (नासिका से लेकर मूर्धा तक ओर मूर्धा से लेकर हृदयतक होनेवाले दोनों प्रकार के स्पर्शो को) विद्वान लोग पूरक (अन्तःपूरक) कहते हैं