Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verse 9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 25, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
अपानेऽस्तंगते प्राणो यावन्नाभ्युदितो हृदि ।
तावत्सा कुम्भकावस्था योगिभिर्यानुभूयते ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
अब कल्पित एवं अकल्पित दोनों तरह से अन्तःकुम्भक प्राणायाम का लक्षण कहते हैं।
महाराज, अपान वायु के प्रशान्त हो जाने पर जव तक हृदय में प्राणवायु का अभ्युदय नहीं होता,
तब तक वह वायु की कुम्भक अवस्था (निश्चल स्थिति) रहती है, जिसका कि योगी लोग अनुभव करते
हैं, क्योकि इस अवस्था में शरीर के भीतर वायु कुम्भित रहता है