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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 26, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 26, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 26 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

भुशुण्ड उवाच । एषा हि चित्तविश्रान्तिर्मया प्राणसमाधिना । क्रमेणानेन संप्राप्ता स्वयमात्मनि निर्मले ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

भुशुण्ड ने कहा : महाराज वसिष्ठजी, मैंने प्राणोपासना द्वारा उक्त रीति से क्रमशः निर्मल हुए आत्मा में यह चित्त विश्रान्ति स्वयं प्राप्त की है

सर्ग सन्दर्भ

पचीसवाँ सर्ग समाप्त छब्बीसवाँ सर्ग प्राणोपासना द्वारा इस प्रकार अपने स्वरूपविज्ञान का निरूपण करने के अनन्तर भुशुण्डजी अपनी चिरंजीविता में हेतुओं का निरूपण करते हैं, यह वर्णन ।