Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 26, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 26, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 26 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
अपरिचलया शक्त्या सुदृशा स्निग्धमुग्धया ।
ऋजु पश्यामि सर्वत्र तेन जीवाम्यनामयः ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
अपने स्वरूप से किसी समय च्युत
न होनेवाली मानसिक स्थिरतारूपी शक्ति के द्वारा हुई स्निग्ध एवं मुग्ध सुन्दर दृष्टि से यानी सब
प्राणियों में आत्मा एक ही है, इस दृष्टि से सब स्थानों में कुटिलता रहितता का ही मैं अनुभव करता हूँ,
इसलिए अनामय होकर जी रहा हूँ