Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 26, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 26, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 26 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
गच्छतस्तिष्ठतो वापि जाग्रतः स्वपतोऽपि वा ।
स्वप्नेऽपि न चलत्येष सुसमाधिर्ममात्मनि ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्मन्, वैठते, जागते या सोते तथा स्वप्नानुभव करते किसी भी अवस्था में मेरी आत्मा में यह
उत्तम समाधि-विचलित नहीं होती