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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 26, Verses 30–31

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 26, verses 30–31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 26 · श्लोक 30

संस्कृत श्लोक

पश्यद्रूपे शरीरेऽस्मिन्भूतस्थात्मा चिदास्पदः । भूतवृन्दमहं साम्यात्तेन जीवाम्यनामयः ॥ ३० ॥ आशापाशविनुन्नायाश्चित्तवृत्तेः समाहितः । संस्पर्शे न ददाम्यन्तस्तेन जीवाम्यनामयः ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

चेतनप्राय इस शरीर के भासमान होने पर भी मैं एकमात्र चैतन्यात्मता का ही अवलोकन करता हू । इसलिए सब भूतो में चिदात्मता की समता होने के कारण सर्वभूतो के अन्दर स्थित आत्मस्वरूप हो रहा मेँ उनको अपने शरीर के सदुश ही देखता हू । यही कारण है कि मैं अनामय होकर दीर्घजीवी हूँ