Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 26, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 26, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 26 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
सुखितोऽस्मि सुखापन्ने दुःखितो दुःखिते जने ।
सर्वस्य प्रियमित्रं च तेन जीवाम्यनामयः ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज, जीर्ण, विदीर्ण, अवयवों से शिथिल क्षीण, क्षुब्ध, चूर्णित एवं विनष्ट हुए सब अतीत,
अनागत ओर वर्तमान के पदार्थो को, विकारशून्य आत्मदृष्टि के कारण नवीन पदार्थो के सदृश देखता
रहता हूँ, इसलिए विकारशून्य दीर्घजीवी हूँ ॥ ३ ३॥ महाराज, सुखी पुरुष को देखकर मैं सुखी होता हूँ,
दुःखी जन को देखकर दुःखी होता हूँ, सभी के लिए मैं प्रिय मित्र हूँ, इसलिए विकारवर्जित चिरंजीवी
हूँ