Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 26, Verse 35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 26, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 26 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
आपद्यचलधीरोऽस्मि जगन्मित्रं च संपदि ।
भावाभावेषु नैवास्मि तेन जीवाम्यनामयः ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
मैं आपत्ति-काल में पर्वत की नाई धीर रहता हूँ, सम्पत्ति-काल में समस्त जगत के प्रति मैत्री
रखता हूँ, सम्पत्ति की वृद्धि या विनाश-दशा में तनिक भी अभिमान नहीं करता | इसलिए मैं चिरंजीवी
हूँ