Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 26, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 26, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 26 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
अहं जगदहं व्योम देशकालक्रमावहम् ।
अहं क्रियेति मे बुद्धिस्तेन जीवाम्यनामयः ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
में ही जगत हूँ, मैं ही आकाश हूँ, मैं
ही देश ओर काल की परम्परा हूँ, मैं ही क्रियारूप हूँ, इस प्रकार की मेरी बुद्धि है इसलिए मे अनामय
होकर चिरंजीवी हूँ