Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 27, Verse 6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 27, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 27 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
कथंचित्प्राप्यते कश्चिद्भ्रान्त्वेव हि महाजनः ।
न भवानिव भव्यात्मा सुलभो जगति क्वचित् ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
वायसराज, प्रयत्न से दीर्घकाल तक परिभ्रमण
कर कोई किसी महाव्यक्ति को किसी तरह प्राप्त कर सकता है, परन्तु आपके सदृश भव्यात्मा ज्ञानी
इस जगत में कहीं पर भी सुलभ नहीं हो सकता