Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 27, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 27, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 27 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
वंशखण्डे हि कस्मिंश्चिज्जायते मौक्तिकं यथा ।
जगत्खण्डे हि कस्मिंश्चिद्दृश्यते त्वादृशस्तथा ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस प्रकार एक बाँस के वन में कहीं-कहीं ही
मोती उत्पन्न होता है, वैसे ही आपके सदृश ज्ञानी जगत के किसी एक कोने में ही दिखालाई देता है।
(मोतियों की आठ खानों में बोस का भी परिगणन है)