Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 28, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
आभासमात्रमेवेदमित्थमेवावभासते ।
द्विचन्द्रविभ्रमाकारं सदसच्च व्यवस्थितम् ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रुति ओर पुराण की आख्यायिकाओं में यह प्रसिद्ध है कि इस देह का निर्माण करनेवाला ईश्वर है
और जीव तो अपने कर्मो के उपभोग के लिए इसका निर्माण करानेवाला हे, फिर इन दोनो का अपलाप
आप कैसे करते है 2 यदि ऐसी कोई शंका करे, तो उस पर कहते हैं।
हे राघव, यह शरीर केवल आभासरूप (अलकमात्र) ही है, बिना निर्माता के ही अवभासित होता
है, द्विचन्द्रविभ्रम के सदुश इसका स्वरूप मिथ्या है तथा प्रतीतिकाल में सद्रूप से और परमार्थदशा में
असद्रूप से स्थित रहता है (जैसे जल में गिरा चन्द्रप्रतिबिम्ब एवं चक्षु पर अंगुलि रखने से हुआ द्वितीय
चन्द्रमा का विभ्रम निर्माता की अपेक्षा नहीं रखता, वैसे ही आभासमात्र यह शरीर भी निर्माता की अपेक्षा
नहीं रखता श्रुति में प्रसिद्ध जो ईश्वरनिमतृत्व है, वह पुरुष निःश्वास दृष्टान्त देखने से मुख्य प्रतीत
नहीं होता, इसी प्रकार जीव का निर्माणकारित्व भी मुख्य नहीं है, क्योकि वैसा निर्माण कराने में न कोई
बुद्धि का उपयोग है और न कोई अनिष्ट का निर्माण ही कराता है ।)