Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 28, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
तथैव तादृशाचारो देहोऽयं मनसः स्मृतः ।
इदं धनमयं देहो देशोऽयमिति विभ्रमः ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
अहन्ताध्यास के विषय शरीर में दिखलाया गया न्याय ममता-अध्यास के विषय धन आदि में भी
समान ही है, इस आशय से कहते हैं।
यह मेरा धन है, यह मेरा शरीर है, यह मेरा देश है, इस प्रकार की जो प्रतीति होती है, वह भी
विभ्रमात्मक ही है, क्योंकि धन आदि सभी कुछ चित्तजनित संकल्प का ही विलास है