Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, Verse 35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 28, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
तथैव दृश्यते देहस्तथाऽऽकृत्युदयेन सः ।
पौरुषेण प्रयत्नेन संकल्पो ह्ययमेव चित् ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामजी, पुरुष के उत्तम प्रयत्न से मन को अन्तर्मुख
बनाकर आत्मतत्त्व का जब साक्षात्कार हो जाता है, तव यह जगदाकार संकल्प चिद्रूप ही हो जाता है
और यदि उसकी विपरीतरूप से भावना की जाय, तो विपरीत ही हो जाता हे