Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, Verse 41
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 28, verse 41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 41
संस्कृत श्लोक
धराप्यविद्यमानापि संकल्पाद्दृश्यते तथा ।
दृश्यते दृष्टिवैरूप्याद्यथा व्योमनि पिच्छिका ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामजी, दृष्टि में विषमता से आकाश में जिस प्रकार मोर
पंखों का एक मुडा-सा दिखाई देता हे, वैसे ही भ्रम से यह जगत की शोभा प्रतीत होती हे