Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, Verse 42
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 28, verse 42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
तथैवेयं जगल्लक्ष्मीर्दुर्ज्ञानादवभासते ।
दृश्यते समया दृष्ट्या न यथा व्योम्नि पिच्छिका ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र,
विशुद्ध दृष्टि से जैसे आकाश में उक्त मोरपंखों का मुडा दिखलाई नहीं पडता, वैसे ही आत्मतत्त्व-
साक्षात्काररूप विशुद्ध दुष्ट से यह जगत की शोभा दिखलाई नहीं पडती