Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, Verse 46
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 28, verse 46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
तस्मिन्न दृश्यते राम मोहोऽयं जगतः स्थितः ।
सम्यगालोकमात्रेण स्वभावः शुद्धिमृच्छति ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
किस उपाय से आत्मा शुद्ध होता है, इस प्रश्न पर शुद्धि का उपाय बतलाते हैँ ।
भद्र, सम्यक् तत्त्वज्ञानरूपी एकमात्र प्रकाश से ही आत्मा शुद्ध हो जाती है, इस प्रकार शुद्ध हुई
आत्मा फिर मोह आदि मल का उस प्रकार ग्रहण नहीं करती, जिस प्रकार भ्रान्ति के कारण ताम्ररूप से
गृहीत हुआ सुवर्ण अग्नि से विशुद्ध होने पर पुनः ताम्ररूपता का ग्रहण नहीं करता