Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, Verse 47
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 28, verse 47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 47
संस्कृत श्लोक
न गृह्णाति मलं भूयस्ताम्रतामिव काञ्चनम् ।
आभासमात्रमेवेदं न सन्नासज्जगत्त्रयम् ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
दर्शनमात्र से आत्मा की शुद्धि कैसे होती है 2 इस शंका पर दृश्यरूप मल एकमात्र आभासरूप ही
है, इससे ऐसा कहते हैं।
हे श्रीरामचन्द्रजी, ये तीनों जगत एकमात्र आभासस्वरूप ही हैं। वे न तो सद्रूप हैं और न असद्रूपही
हैं, इसलिए तत्त्वज्ञान ही आत्मा से अतिरिक्त कल्पित पदार्थों की निवृत्ति है