Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, Verse 48
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 28, verse 48 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 48
संस्कृत श्लोक
इत्यन्यकलनात्यागः सम्यगालोकनं विदुः ।
मरणं जीवितं स्वर्गो ज्ञानमज्ञानमेव च ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
तब सम्यक् ज्ञान कैसा है, उसे कहते है ।
मरण, जीवन, स्वर्ग, ज्ञान ओर अज्ञान कुछ भी चैतन्य पदार्थ को छोडकर दूसरा पदार्थ नहीं है,
इसलिए चिन्मात्र-परिशेष ही तत्त्वज्ञान है